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घड़ा कैसा बने?-इसकी एक प्रक्रिया है। कुम्हार मिटटी घोलता, घोटता, घढता व सुखा कर पकाता है। शिशु, युवा, बाल, किशोर व तरुण को संस्कार की प्रक्रिया युवा होते होते पक जाती है। राष्ट्र के आधारस्तम्भ, सधे हाथों, उचित सांचे में ढलने से युवा समाज व राष्ट्र का संबल बनेगा: यही हमारा ध्येय है। "अंधेरों के जंगल में, दिया मैंने जलाया है। इक दिया, तुम भी जलादो; अँधेरे मिट ही जायेंगे।।" (निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpan पर इमेल/चैट करें, संपर्कसूत्र- तिलक संपादक युगदर्पण
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Saturday, November 9, 2013

'राष्ट्र-ऋषि श्री दत्तोपंत ठेंगडी' एक जीवनी

'राष्ट्र-ऋषि श्री दत्तोपंत ठेंगडी' एक जीवनी
हे राष्ट्र-ऋषि श्री दत्तोपंत ठेंगडी - युगदर्पण मीडिया परिवार करता हैं, तुमको शत शत नमन!
श्री दत्तोपंत ठेंगडी - नमन! हे राष्ट्र-ऋषि तुमको
-विनोद बंसल, लेखक-9810949109

श्री दत्तोपंत ठेंगडी जी का नाम मन में आते ही, उनके जीवन के विविध आयाम, अनायास ही मन-मस्तिष्क में उभर कर सामने आ जाते हैं। एक ज्येष्ठ स्वतंत्रता सेनानी, कुशल संघटक, अनेक राष्ट्र प्रेमी संगठनों के शिल्पकार, विख्यात विचारक, लेखक, संतो के समान त्यागी और संयमित जीवन जीने वाले, श्री दत्तोपंत जी ठेंगडी ने भारतीय किसानों व मजदूरों को ससम्मान जीवन जीने का अवसर तो प्रदान कराया ही, भारत की कीर्ति विश्व पटल पर अंकित करने में भी उन्होंने अनुपम भूमिका निभाई।

 10 नवंबर 1920 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के आर्वी शहर में जन्मे, श्री ठेंगडी एक प्रसिद्ध वकील श्री बाबुराव दाजीबा ठेंगडी के ज्येष्ठ पुत्र थे। बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि, और सामाजिक कार्य के प्रति ललक ने, उन्हें विद्यार्थी जीवन में ही स्वतंत्रता संग्राम में उतार दिया। केवल 15 वर्ष की आयु में ही वे आर्वी तालुका नगरपालिका हाईस्कूल के अध्यक्ष चुने गए।

स्नातकोत्तर और विधि स्नातक की औपचारिक शिक्षा पूरी करने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशवराव बलीराम हेडगेवार और श्री गुरूजी के जीवन से प्रेरणा लेकर सन 1942 से 1945 तक उन्होंने केरल जैसे ईसाई बाहुल्य राज्य और 1945 से 1948 तक साम्यवादियों के ग़ढ माने जाने वाले बंगाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक के रूप में कार्य किया। इन दोंनों राज्यों में उस समय संघ कार्य करना अत्यन्त दुष्कर था, जिसे उन्होंने अपने परिश्रम व सूझ-बूझ से गति प्रदान की।

सन 1949 से वे मजदूर क्षेत्र की विविध समस्याओं के गहन अध्ययन में जुट गए और अक्तूबर 1950 में वे पहली बार इंटक (Indian National Trade Union Congress) की राष्ट्रीय परिषद सदस्य तथा मध्य प्रदेश इंटक शाखा के संगठन मंत्री चुने गए। 1952 से 1955 के मध्य कम्युनिस्ट प्रभावित ऑल इंडिया बैंक एम्प्लाइज एसोसिएशन (ए.आई बी.ई.ए.) नामक मजदूर संगठन के प्रांतीय संगठन मंत्री रहते हुए उन्होंने पोस्टल, जीवन-बीमा, रेल्वे, कपडा व कोयला उद्योग से संबंधित मजदूर संगठनों के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। इसी मध्य वे पत्रकारिता व लेखन जगत से भी जुडे और हिंदुस्तान समाचार नामक बहुभाषी समाचार संस्था के संगठन मंत्री बने।

1955 से 1959 के बीच मध्यप्रदेश तथा दक्षिणी प्रांतों में भारतीय जनसंघ की स्थापना और जगह-जगह पर जनसंघ का बीजारोपण करने का दायित्व भी ठेंगडी जी पर ही रहा। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। 1955 में ही पर्यावरण मंच तथा सर्व धर्म समादर मंच की स्थापना भी उन्होंने की।

23 जुलाई 1955 के दिन, उन्होंने छोटे छोटे मजदूर संघों को मिलाकर भारतीय मजदूर संघ (बी. एम. एस.) नामक एक ऐसे वट वृक्ष का बीजारोपण किया। जिसके बारे में उन्होंने भी शायद ही ऐसी कल्पना की होगी कि वह विश्व का सबसे बडा व सर्व श्रेष्ठ मजदूर संगठन बन जाएगा। देखते ही देखते बीएमएस आज मात्र एक संगठन ही नहीं, बल्कि संगठनों का संगठन बन, मजदूरों व मालिकों के विविध संगठनों के बीच एक बडी कडी बन गया है। एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में इसकी सदस्य संख्या 50 लाख को पार कर चुकी है।

1967 में उन्होंने भारतीय श्रम अन्वेषण केन्द्र व 1990 में स्वदेशी जागरण मंच की नींव डाली। राज्य सभा के सदस्य रहते, संसदीय कार्यकाल में मजदूर संघ का प्रतिनिधित्व करते हुए, उन्होंने अनेक बार विदेश यात्रा की। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठनों में भारत का प्रतिनिधित्व व विदेशों के मजदूर आन्दोलनों का अध्ययन करने हेतू उन्होंने अमेरिका, युगोस्लाविया, चीन, कनाडा, ब्रिटेन, रूस, इंडोनेशिया, म्यानमार, थाईलैण्ड, मलेशिया, सिंगापुर, कीनिया, युगांडा तथा तंजानिया जैसे अनेक देशों का भ्रमण किया और 1977 के स्विट्जरलैण्ड में हुए, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के 68वें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया। 1985 में अखिल चाइना ट्रेड यूनियन फेडरेशन के निमंत्रण पर, भारतीय मजदूर संघ के पॉच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए, उन्होंने चीन में जो भाषण दिया, उसे बीजिंग रेडियो से भी प्रसारित किया गया। अमेरिका व ब्रिटेन सहित विश्व के अनेक देशों ने उनके कौशल का लोहा मानते हुए, उन्हें अपने -अपने देशों में व्याप्त मजदूरों व किसानों से सम्बन्धित समस्याओं के अध्ययन व् समाधान हेतु आमंत्रित किया। विश्व पटल पर वे इन विषयों के विशेषज्ञ माने जाते थे।

प्रखर सोच व उत्तम विचारों के धनी श्री दत्तोपंत जी ने हिंदी, अंग्रेजी और मराठी में लगभग सौ से अधिक पुस्तकों का लेखन किया। उनकी कृतियों में ‘राष्ट्र’, ‘ध्येयपथ पर किसान’, ‘तत्व जिज्ञासा’, ‘विचार सूत्र’, ‘संकेत रेखा’, ‘Third Way’, ‘एकात्म मानववाद-एक अध्ययन’, ‘डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर’, ‘सप्त क्रम लक्ष्य और कार्य’ आदि प्रमुख थीं।

50 वर्ष से अधिक समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सृजनात्मक कार्यो के लिए, एक विस्तृत पृष्ठ भूमि तैयार करते हुए, उन्होंने भारतीय किसान संघ, सामाजिक समरसता मंच, सर्व पंथ समादर मंच, स्वदेशी जागरण मंच, संस्कार भारती, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, भारतीय विचार केंद्र, अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत आदि संगठनों का निर्माण किया। देश का शायद ही कोई ऐसा मजदूर संगठन होगा, जिसे दत्तोपंत जी का मार्गदर्शन न मिला हो। समाज के कमजोर वर्गो यानि शोषित श्रम-जीवियों की हालत सुधारने के लिए, केवल वैचारिक योगदान ही नहीं दिया, बल्कि देशभर में अन्याय, अत्याचार, विषमता और दीनता से जूझने के लिए, कर्मठ व लगनशील कार्यकर्ताओं का निर्माण भी किया।

कम्युनिस्ट समेत अनेक विचार-धाराओं के शीर्ष नेताओं से उन्होंने आत्मीयता पूर्ण संबंध स्थापित किए। भण्डारा से जब बाबा साहेब अम्बेडकर लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे, तब उनके चुनाव प्रभारी के नाते उन्होंने कार्यभार संभाला था। अम्बेडकर जी से घनिष्ट संबन्धों के चलते, उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिनों में श्री बाबासाहेब अम्बेडकर पर एक पुस्तक भी लिखी।

पद्म भूषण लेने से इनकार

वे ऐसे महा-पुरुष थे, जो प्रसिद्धि व प्रतिष्ठा की आकांक्षा से कोसों दूर थे। सन 2003 के गणतंत्र दिवस के अवसर पर, उन्हें प्रसिद्ध भारतीय सम्मान पद्म भूषण के लिए चुना गया, किन्तु उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति श्री एपीजे अब्दुल कलाम को एक पत्र लिख कर, इसे लेने के लिए असमर्थता प्रकट करते हुए कहा कि वह स्वयं को इस अलंकरण के योग्य नहीं समझते। उन्होंने कहा है कि सरकार को यदि कोई अलंकरण देना ही था, तो उसे सर्वप्रथम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के जन्मदाता डा. केशवराव बलीराम हेडगेवार और संघ का कार्य देश विदेश में फैलाने वाले श्री माधव सदाशिव राव गोलवलकर (श्री गुरूजी) को भारत रत्न से अलंकृत किया जाना चाहिए था। वे तो संघ परिवार की मात्र एक शाखा के अगुआ भर रहे हैं।

उनको श्रद्धांजलि देते हुए, विवेकानंद केन्द्र (कन्याकुमारी) के अध्यक्ष एवं भारतीय विचार केन्द्रम के निदेशक श्री पी. परमेश्वरन ने लिखा है कि वे एक प्रखर विचारक, असाधारण संगठक और विद्वान तो थे ही, एक महान कार्यकर्ता भी थे। स्पष्ट तथ्यात्मकता के साथ वे एक ऐसे सिद्धान्तवादी थे, जो कभी समझौता नहीं करते। भारत का सबसे बड़ा श्रमिक संगठन, 'भारतीय मजदूर संघ' उनके व्यावहारिक आदर्शवाद का जीता-जागता उदाहरण है। ऐसे समय में जब प्रत्येक राजनीतिक दल का एक श्रम प्रकोष्ठ था, ठेंगडी जी ने बड़े साहस के साथ किसी राजनीतिक दल से बिल्कुल असम्बद्ध रहने वाला, भारतीय मूल्यों के आधार पर श्रमिक संगठन खड़ा किया था। भारतीय मजदूर संघ की सफलता सिद्ध करती है, कि भारत को एक राष्ट्रवादी आंदोलन खड़ा करने के लिए, किसी विदेशी विचारधारा की जरूरत नहीं है। विचारों की स्पष्टता, अभिव्यक्ति की तीक्ष्णता और समझ की गहनता, उनको अपने समय की एक महानतम विभूति बनाती है। प्रसिद्धि-पराङगमुखता, उन्हें अन्य नेताओं व विभूतियों से बिल्कुल अलग, 'एक देदीप्यमान व्यक्तित्व' प्रदान करती थी। केवल संघ विचार परिवार में ही नहीं, उनके मित्र और प्रशंसक विश्व भर में हैं।

ऐसे राष्ट्र ऋषि को शत्-शत् नमन्।
राष्ट्र-ऋषि, ठेंगडीजी, विख्यात विचारक, लेखक, संघटक, भामसं जनक,
http://jeevanmelaadarpan.blogspot.in/2013/11/blog-post.html
http://pratibhaprabandhanparinatidarpan.blogspot.in/2013/11/blog-post_9.html

कृ यह भी देखें भारत जागो दौड़- आह्वान

देश की श्रेष्ठ प्रतिभा, प्रबंधन पर राजनिति के ग्रहण की परिणति दर्शाने का प्रयास | -तिलक संपादक
पत्रकारिता व्यवसाय नहीं एक मिशन है| -युगदर्पण
हम जो भी कार्य करते हैं, परिवार/काम धंधे के लिए करते हैं |
 देश की बिगडती दशा व दिशा की ओर कोई नहीं देखता | आओ मिलकर इसे बनायें; -तिलक
यह राष्ट्र जो कभी विश्वगुरु था, आज भी इसमें वह गुण,
 योग्यता व क्षमता विद्यमान है | आओ मिलकर इसे बनायें; - तिलक
"अंधेरों के जंगल में, दिया मैंने जलाया है |
इक दिया, तुम भी जलादो; अँधेरे मिट ही जायेंगे ||"- तिलक