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घड़ा कैसा बने?-इसकी एक प्रक्रिया है। कुम्हार मिटटी घोलता, घोटता, घढता व सुखा कर पकाता है। शिशु, युवा, बाल, किशोर व तरुण को संस्कार की प्रक्रिया युवा होते होते पक जाती है। राष्ट्र के आधारस्तम्भ, सधे हाथों, उचित सांचे में ढलने से युवा समाज व राष्ट्र का संबल बनेगा: यही हमारा ध्येय है। "अंधेरों के जंगल में, दिया मैंने जलाया है। इक दिया, तुम भी जलादो; अँधेरे मिट ही जायेंगे।।" (निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpan पर इमेल/चैट करें, संपर्कसूत्र- तिलक संपादक युगदर्पण
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Wednesday, December 18, 2013

देवयानी खोब्रागडे, व अमानवीय अमरीका

देवयानी खोब्रागडे, व अमानवीय अमरीका 
भारतीय विदेश सचिव सुजाता सिंह की कथित अतिसफल वाशिंगटन यात्रा संपन्न होने के अगले ही दिन 
न्यूयार्क में उप महावाणिज्य दूत 1999 भाविसे चयनित देवयानी खोब्रागडे का अमानवीय अपमान भारत और अमेरिका के बीच राजनयिक दायित्वों व मर्यादा का उलंघन है। तुच्छ से आरोपों के चलते उन्हें प्रत्यक्ष हथकड़ी लगाकर बंदी बना लिया गया। न्यूयार्क में उप महावाणिज्य दूत सहित राजनयिकों के साथ ऐसा व्यवहार के विरुद्ध अमेरिका से कड़ी आपत्ति प्रकट करते हुए, भारत ने इसे ‘पूरी तरह से अस्वीकार्य’ कहा है।
 उक्त घटना के बाद उसने कैसे मान लिया भारत और अमेरिका के बीच राजनयिक संकट पैदा नहीं हो सकता। किन्तु युगदर्पण की दृष्टी में चिंता का उससे भी बड़ा विषय यह है कि इससे भारत को अपमान के कड़वे घूँट पीने पड़ेंगे। जब मानवाधिकारों के हनन के नाम पर दूसरे देशों को दण्डित करने वाला महिला का अपमान व ऐसे अमानवीय कार्य करेगा, अपने लिए दण्ड भी निर्धारित करना चाहिए अन्यथा उसकी स्टैचू ऑफ़ लिबर्टी व मानवाधिकार के पाखण्ड नंगे हो जायेंगे।
 यदि अमरीका और उसका राष्ट्रपति वास्तव में स्टैचू ऑफ़ लिबर्टी तथा स्वतंत्रता व मानवाधिकारों का सम्मान करते हैं, तो बिना विलम्ब किये अपनी गलती स्वीकारते हुए क्षमा मांग लेनी चाहिए, क्योंकि गलती स्वीकारने या क्षमा मांगने में ही बड़प्पन है, अकड़ने में नहीं।
बड़प्पन बड़े देश या पद में नहीं, दिल भी बड़ा होना चाहिए। 
अन्यथा अमरीका और उसके राष्ट्रपति को विश्व महाशक्ति के शासक से अधिक राक्षस के रूप में जानेगी।
 तिलक राज रेलन, सम्पादक युगदर्पण मीडिया समूह YDMS -09911111611
अन्यत्र, हिन्दू समाज व हिदुत्व और भारत, को प्रभावित करने वाली
जानकारी का दर्पण है: विश्वदर्पण | आओ, मिलकर इसे बनायें; -तिलक
"अंधेरों के जंगल में, दिया मैंने जलाया है |
इक दिया, तुम भी जलादो; अँधेरे मिट ही जायेंगे ||"- तिलक