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घड़ा कैसा बने?-इसकी एक प्रक्रिया है। कुम्हार मिटटी घोलता, घोटता, घढता व सुखा कर पकाता है। शिशु, युवा, बाल, किशोर व तरुण को संस्कार की प्रक्रिया युवा होते होते पक जाती है। राष्ट्र के आधारस्तम्भ, सधे हाथों, उचित सांचे में ढलने से युवा समाज व राष्ट्र का संबल बनेगा: यही हमारा ध्येय है। "अंधेरों के जंगल में, दिया मैंने जलाया है। इक दिया, तुम भी जलादो; अँधेरे मिट ही जायेंगे।।" (निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpan पर इमेल/चैट करें, संपर्कसूत्र- तिलक संपादक युगदर्पण
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Sunday, March 10, 2013

ऐ दिल तूँ हताश न हो !

ऐ दिल तूँ हताश न हो !
देश की वर्तमान दुर्दशा से कई बार कई मित्र हताश हो जाते हैं 
चल सभ्यता की ढहती दीवार से हम कहीं दूर चलें ये कहते हैं मित्रो,
                     ऐ दिले बेकरार तू हताश न हो के ये दिन डूब गया, 
                     रात भर का है मेहमान अँधेरा किसके रोके रुका है सवेरा 
दूर जाकर भी जब चैन नहीं पाया तब मेरे मित्र बताओ कहाँ जाओगे, 
अच्छा या बुरा जैसा भी है समाज मेरा है सुधारना ही लक्ष्य है मेरा; 
घर किराये का नहीं है मेरा अपना ही, साफ करने का सोचना है मुझे,
सोने की चिड़िया के पर नोच दिए दुष्टों ने, दवा इसको लगाना है मुझे। 
-तिलक YDMS, 9911111611. 
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"अंधेरों के जंगल में, दिया मैंने जलाया है |
इक दिया, तुम भी जलादो; अँधेरे मिट ही जायेंगे ||" युगदर्पण