Desh Bhaktike Geet

what's App no 9971065525 DD-Live YDMS दूरदर्पण विविध राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय विषयों पर दो दर्जन प्ले-सूची https://www.youtube.com/channel/UCHK9opMlYUfj0yTI6XovOFg एवं CD-Live YDMS चुनावदर्पण https://www.youtube.com/channel/UCjS_ujNAXXQXD4JZXYB-d8Q/channels?disable_polymer=true Old
घड़ा कैसा बने?-इसकी एक प्रक्रिया है। कुम्हार मिटटी घोलता, घोटता, घढता व सुखा कर पकाता है। शिशु, युवा, बाल, किशोर व तरुण को संस्कार की प्रक्रिया युवा होते होते पक जाती है। राष्ट्र के आधारस्तम्भ, सधे हाथों, उचित सांचे में ढलने से युवा समाज व राष्ट्र का संबल बनेगा: यही हमारा ध्येय है। "अंधेरों के जंगल में, दिया मैंने जलाया है। इक दिया, तुम भी जलादो; अँधेरे मिट ही जायेंगे।।" (निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpan पर इमेल/चैट करें, संपर्कसूत्र- तिलक संपादक युगदर्पण
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Friday, January 14, 2011

देश का युवा शिक्षित हो कर भी देश समाज के विषय में भ्रमित क्यों?

देश का युवा शिक्षित हो कर भी देश समाज के विषय में भ्रमित क्यों?
केवल युवा ही नहीं पूरे समाज में भ्रम का वातावरण बनाने में लगा, बिकाऊ मीडिया किस सीमा तक गिर चुका है; इसका एक अंश नीरा राडिया कांड ने दिखा दिया! मेरी जिस बात को 10 वर्ष पूर्व समझने में लोगों को कठिनाई आती थी, अब अधिकांश लोग जान ही नहीं मान भी रहे हैं! उसी नकारात्मक मीडिया का सार्थक विकल्प 10 वर्ष से ही "राष्ट्रीय साप्ताहिक युगदर्पण हिंदी"! 
विडम्बना यह है कि जो युवा समाज की शक्ति का स्त्रोत होना था; मैकालेवादी शिक्षा ने उसे अन्य विषयों में पारंगत बनाते हुए भी भारतीयता की शिक्षा से विमुख रखा! जिससे एक ओर वो पश्चिमानुरागी बने, स्वयं को शिक्षित मान भारतीयता से ही विमुख हो जाये! किन्तु जहाँ वे कुछ सफल भी हुए, तहाँ प्रबल पारिवारिक संस्कार ने स्थिति का संभाला भी है! पश्चिमी कुचक्र केवल समाज जीवन के एक दो क्षेत्रों तक सीमित नहीं थे, किन्तु उनकी रोक, जो कभी हुई भी तो सीमित आयामों के कारण, उतनी व्यापक व प्रभावी न हो सकी! मीडिया के ही माध्यम उन विभिन्न आयामों को जानने का प्रयास है विविध विषयों के 25 ब्लाग:-

युग दर्पण हिंदी राष्ट्रीय समाचारपत्र

(भारत सरकार के सूचना प्रसारण के समाचार पत्र पंजीयक द्वारा पंजी RNI DelHin 11786/2001) 9वर्ष पूर्व स्वस्थ समाचारों के प्रतिनिधि बना युगदर्पण अब उनके प्रतीक के रूपमें पहचाना जाता है. विविधतापूर्ण किन्तु सप्तगुणयुक्त- सार्थक,सटीक,स्वस्थ,सोम्य, सुघड़,सुस्पष्ट,व सुरुचिपूर्ण पत्रकारिता का एक ही नाम युगदर्पण. पत्रकारिता व्यवसाय नहीं एक मिशन है-युगदर्पण(हरयाणा/पंजाब में सूचीबद्ध).निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण 9911111611,



देश की मिटटी से जुडे लोगों का मंच.-- नई तकनीक स्वीकारने के साथ ही विश्व को भारत की वो सौगात /उन महान मूल्यों की रक्षा, हर हाल करना, व्यापक मानवीय आधार है. द्वार खुले रखने का अर्थ अँधानुकरण/प्रदुषण स्वीकारने की बाध्यता नहीं.(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्क सूत्र -तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,09911145678, 09540007993 

देश की मिटटी--

देश केवल भूमि का एक टुकड़ा,एक आरामगाह,एक बाज़ार,समझते हैं जो लोग,कितना ही लुटा दो उन पर संतुष्ट नहीं होते.वो जानते हैं शोर मचाकर और लूट सकते हैं,कर्तव्य नहीं है कुछ उनका,अधिकारों का मचाते शोर हैं.कर्तव्य हिन्दू के अधिकार दूसरों के-यह आज़ादी कैसी व किस की? इसमें वोटबैंक राजनीति,देश की सुरक्षा से खिलवाड़,किसी के हित में नहीं,स्वार्थवश राष्ट्रद्रोह है-तिलक.(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,9911145678,9540007993
"कार्य ही पूजा है/कर्मण्येव अधिकारस्य मा फलेषु कदाचना" दृष्टान्त का पालन होता नहीं,या होने नहीं दिया जाता, जो करते हैं उन्हें प्रोत्साहन की जगह तिरस्कार का दंड भुगतना पड़ता है. आजीविका के लिए कुछ लोग व्यवसाय,उद्योग,कृषि से जुडे, कुछ सेवारत हैं रेल,रक्षा. सभी का दर्द उपलब्धि, तथा परिस्थितियों सहित कार्यक्षेत्र का दर्पण. तिलक..(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें, संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,09911145678,0954000799
पर्यावरण दर्पण:-
आधुनिकता के प्रदूषण से संरक्षण 
-आधुनिक विकास के नाम पश्चिमी मशीनीकरन स्वचालित अँधानुकरण से सृजन नहीं गैस उत्सर्जन होता है.यही नहीं आडम्बर में प्रयुक्त लकड़ी हेतु वृक्ष काट कर प्रकृति का विसर्जन होता है.सृष्टी में जीवन को चाहिए शुद्ध जल और शुद्ध वायु. जलवायु/पर्यावरण के संरक्षण हेतु जुटें. तिलक..(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,09911145678,09540007993
पर्यटन केवल उद्योग ही नहीं है,यह इतिहास को भी जीवित रखता है,धरोहर से परिचित करता है.भारत जब तक इतिहास को जीता था भारत था,'इंडिया' बन,इतिहास भूलने व बिगाड़ने की पतन की राह चलने लगा है. परिणाम यूनान मिस्त्र रोम से भी घातक होगा. कुछ लोग इतिहास पड़ते,पढ़ाते हैं कुछ बिगाडते हैं.हम वो(भारत माता के लाल)हैं जो अनुकरणीय इतिहास घडते/ रचते है.तिलक.(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611, 09911145678,09540007993
यह राष्ट्र जो कभी विश्वगुरु था,आजभी इसमें वह गुण,योग्यता व क्षमता विद्यमान है.किन्तु प्रकृति के संसाधनों व उत्कृष्ट मानवीयशक्ति से युक्त इस राष्ट्रको काल का ग्रहण लग चुका है.जिस दिन यह ग्रहणमुक्त हो जायेगा,पुनः विश्वगुरु होगा. राष्ट्रोत्थानका यह मन्त्र पूर्ण हो,आइये,युगकी इस चुनोतीको भारतमाँ की संतान के नाते स्वीकारकर हम सभी इसमें अपना योगदान दें.निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता वyugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र- तिलक.संपादक युगदर्पण 09911111611,09911145678,09540007993. 

    समाज के उच्च आदर्श,मान्यताएं,नैतिक मूल्य और परम्पराएँ कहीं लुप्त होती जा रही हैं. विश्व गुरु रहा वो भारत इंडिया के पीछे कहीं खो गया है. ढून्ढ कर लाने वाले को पुरुस्कार कुबेर का राज्य.तिलक.(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/ अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,9911145678,9540007993.

    सत्यदर्पण:-

    कलयुग का झूठ सफ़ेद, सत्य काला क्यों हो गया है ?
     -गोरे अंग्रेज़ गए काले अंग्रेज़ रह गए.जो उनके राज में न हो सका पूरा,मैकाले के उस अधूरे को 60 वर्ष में पूरा करेंगे उसके साले.विश्व की सर्वश्रेष्ठ उस संस्कृति को नष्ट किया जा रहा है.देश को लूटा जा रहा है.दिन के प्रकाश में सबके सामने सफेद झूठ;और अंधकार में लुप्त सच्च.भारतीय संस्कृति की सीता का हरण करने देखो साधू वेश में फिर आया रावण.-तिलक 
    तक्षशिला और नालंदा विश्व विद्यालयों को अग्नि की भेंट कर वो कहते हैं तुम अज्ञानी हो,पश्चिम की शिक्षा को ही कल्याण का मार्ग समझाया जाता है.सत्य हम जानते हैं,हमें यह नहीं,विश्व गुरु की शिक्षा चाहिए.
    पश्चिमके कदम सदा लूट केलिए उठे,हमारे पग सदा विश्वकल्याण हेतु आगे बड़े.जिस देश में गए,शोषण नहीं किया अर्थ व्यवस्था को उठाया.ऐसे समाज के प्रति मिडिया दुष्प्रचारसे ऑस्ट्रेलिया जैसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति,अन्यत्र हिन्दू समाज व हिदुत्व और भारत को प्रभावित करने वाली जानकारी का दर्पण है विश्वदर्पण. तिलक.(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र- तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,9911145678,9540007993. 




    कभी रेल सा दौड़ता है यह जीवन. कहीं ठेलना पड़ता. रंग कुछ भी हो हंसते या रोते हुए जैसे भी जियो, फिर भी यह जीवन है. सप्तरंगी जीवन के विविध रंग, उतार चढाव, नीतिओं विसंगतियों के साथ दार्शनिकता व यथार्थ जीवन संघर्ष के आनंद का मेला है- तिलक..(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें, संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,09911145678,09540007993. 

    ब्लाग विवरण/संपर्कसूत्र-

    जीवन में हास्य ठिठोली आवश्यक भले ही हो,किन्तु जीवन ही कहीं ठिठोली न बन जाये यह भी देखना होगा.सबको साथ ले हंसें किसी पर नहीं! मनोरंजन और छिछोरापन में अंतर है.स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में अंतर है.अधिकार से पहले कर्तव्यों को भी समझें. तिलक.(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/ अनुसरण/ निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/ चैट करें, संपर्कसूत्र- तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611, 09911145678,09540007993 

    काव्यांजलिका:-

    कवियों, लेखकों का शुभ्रमंच:-विश्व को नौ रस समझा कर, प्रत्येक में मूर्धन्य महाकवियों से समृद्ध भारत में दिनकर के बाद, भांड और भाट, पूछे और पूजे जाने लगे, तब और दिनकर कहाँ से पैदा होंगे? समुन्द्र से गहरा, वासनामुक्त हो-साहित्य.तिलक.(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,09911145678,09540007993.

    प्रबुद्ध एवं राष्ट्रवादी कलमरथियो,

    काव्यांजलिका में हिन्दी की समस्त विधाओं में रचित अप्रकाशित,मौलिक तथा स्तरीय रचनाओं का स्वागत है। रचनाकार अपनी रचनाएं हिन्दी के किसी भी फोंट में माईक्रोसोफट वर्ड अथवा पेजमेकर में टाईप कर, स्वरचित है इसका सत्यापन कर yugdarpan@gmail.com पर भेज सकते है,प्राथमिकता दी जाएगी। । यदि किसी अप्रत्याशित कारणवश रचनाएं एक सप्ताह तक प्रकाशित ना हो पाए अथवा किसी भी प्रकार की सूचना प्राप्त ना हो पाए तो कृपया पुनः स्मरण दिलवाने का कष्ट करें। ये आपका ही साझा मंच है.धन्यवाद 
    रचनाकार का
    कृति,आकृति,अनुकृति,रचनाधर्मी का मंच
    आरंभ से ही रचनाकारिता मानव सभ्यता के विकास का मंत्र रही है.आज विध्वंस के आतंक के बीच फिर से रचनाकार को ढूँढता और उन्हें प्रोत्साहन हेतु है यह मंच.कृति,विकृति,आकृति,अनुकृति,मंचन,गायन,संगीत,चित्रकला,इन सब में "कला वही जो मन को छू ले,विकृत हो तो विकार तुम्हारा!".(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/ अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें 

    CHETNA KE DO AYAM

    Rashtra ke gaurav aur vyaktiyon ki urja nashta hone se bachana . Ek or aitihasik tathyon ko todmarod kar bhramit karne va logon ko durvyasanon /vyadhion ka shikar banane ke kuchakra samjhen /unse mukti payen."NASHAA"--Desh ki Urjaa v Samarth ko nashta karneke kuchakra kaa hi Naam hai.Bhaarat ko Arth v Bal se khokhlaa karneke Kuchakra mein lage tatva ise phailaa rahe hain.FFC v Nashekaa ApraadhJagat se gehraa sambandh hai.Kuchakra Kusanga Vikruti Bigaarhaa, 
    Yahee Raashtrake Shatru Hamaaraa. Nasheki latase Gharko Ujaarhaa,Ab bhee chetyen,Phailey Ujiyaaraa.Feelfree to Comment on/follow/subsc.blogs, Email/Chat-yugdarpanh on Yahoo/Ggl, contact Tilak Editor YugDarpan 09911111611, 09911145678,09540007993 

    फिल्म फैशन क्लब फंडा :--(चमकता काला सच)

    मृगतृष्णा रेगिस्तान में भटका देती है,यह जानते हैं सब लोग;फिर भी चमक से खिच जाते कुछ लोग,क्या है फिल्म,फैशन,क्लब का सच? उद्योग के रूप में मान्यता लेकर सरकार से सुविधा व पोषण भी पाते हुए अपराध,अनैतिकता व असामाजिकता के प्रशिक्षण केंद्र बन चुके इसके वर्तमान स्वरूप के कारण समाज के मूल्य,आदर्श,परम्पराएँ,अंतिम साँस लेरहे हैं.अपराध का हाथ,'फिफैक्लब' केसाथ.(निस्संकोच ब्लॉगपर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,09911145678,09540007993.

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    तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें

    कभी विश्व गुरु रहे भारत की धर्म संस्कृति की पताका, विश्व के कल्याण हेतू पुनः नभ में फहराये. सार्थक और सटीक जानकारी का दर्पण. तिलक.(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,09911145678,09540007993. 

      सुखसुविधा की खोजमें आज की भागदौड़ ने हमारे जीवनसे स्वस्थ व शांति को छीन हमें विचलित कर दिया है.तन,मन व वातावरण सहित पूरा परिवेश पश्चिमकी भेंट चढ़ गया है.उसे सही मार्ग पर लाने हेतु खानपान,रहनसहन,रीतिरिवाज़ सहित संस्कारित करने हेतु तत्त्वज्ञान,वास्तु,योग,आयुर्वेद का अनुसरण कर हम अपने जीवनको उचित शैली में ढाल सकते हैं.यदि आप इस विषयमें विशेष योग्यता रखते है,लिखें,निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,9911145678. 
      कभी ज्ञान विज्ञान से विश्व गुरु बना भारत आज विश्व पिच्छलग्गू बन चुका है, हनुमान की भांति जब निज विस्मृति(lostMemory) से बाहर आयेगा, वैदिक ज्ञान की आभा(glory) पहचानेगा,चमकाएगा; तब तक केवल नारे से भ्रमायेगा. स्वर्ण युग की उस शक्ति को पहचान देगा ज्ञानविज्ञान दर्पण. तिलक.(Join us to Build StrongBHARAT निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/ निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,09911145678, 09540007993. 
      घर 4 दीवारी से नहीं 4 जनों से बनता है,परिवार उनके प्रेम और तालमेल से बनता है. सभी कार्यों को जोड़ कर साधना,सफल गृहणी का काम है. नौकरीवाली से पैसा बनेगा/घर नहीं. प्रभाव और दुर्भाव में,आधुनिक/पारिवारिक तालमेल से उत्तम घर परिवार से देश आगे बड़े. रसोई,बच्चों-परिवार की देख भाल,गृह सज्जा के बीच अपने लिए भी ध्यान देती शिक्षित नारी-(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/ निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैटकरें, संपर्कसूत्र- तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,9911145678,09540007993. 
      घड़ा कैसा बने?-इसकी एक प्रक्रिया है.कुम्हार मिटटी घोलता,घोटता,घढता व सुखा कर पकाता है! शिशु,युवा,बाल,किशोर व तरुण को संस्कार की प्रक्रिया युवा होते होते पक जाती है!राष्ट्र के आधारस्तम्भ, सधेहाथों, उचितसांचे में ढलने से युवा समाज व राष्ट्र का संबल बनेगा: यही हमारा ध्येय है!"अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है!इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे!!"(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्कसूत्र-तिलक संपादक युगदर्पण 09911111611,09540007993. 

        ब्लाग विवरण, संपर्कसूत्र-

        प्रतिभा और प्रबंधन में विश्व का श्रेष्ठतम होते हुए भी राजनिति के दुष्प्रभाव से उसे बदरंग बनाती परिस्थितियों में उचित मार्ग अपना कर श्रेष्ठता प्रमाणित की जा सकती है. देश की श्रेष्ठ प्रतिभा,प्रबंधन पर राजनिति के ग्रहण की परिणति क्या होगी यही दर्शाने का प्रयास है.(निस्संकोच ब्लॉग पर टिप्पणी/अनुसरण/ निशुल्क सदस्यता व yugdarpanh पर इमेल/चैट करें,संपर्क सूत्र -तिलक संपादक युगदर्पण 9911111611,09911145678,09540007993 

        "अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है! इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!"- तिलक

        Tuesday, January 11, 2011

        लाल बहादुर शास्त्री (जीवन आदर्श, प्रतिभा)

        लाल बहादुर शास्त्री (जीवन आदर्श, प्रतिभा) 

        लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म शारदा श्रीवास्तव प्रसाद, स्कूल अध्यापक व रामदुलारी देवी. के घर मुगलसराय(अंग्रेजी शासन के एकीकृत प्रान्त), में हुआ जो बादमें अलाहाबाद [1] के रेवेनुए ऑफिस में बाबू हो गए ! बालक जब 3 माह का था गंगा के घाट पर माँ की गोद से फिसल कर चरवाहे की टोकरी (cowherder's basket) में जा गिरा! चरवाहे, के कोई संतान नहीं थी उसने बालक को इश्वर का उपहार मान घर ले गया ! लाल बहादुर के माता पिता ने पुलिस में बालक के खोने की सुचना लिखी तो पुलिस ने बालक को खोज निकला और माता पिता को सौंप दिया[2].
        बालक डेढ़ वर्ष का था जब पिता का साया उठने पर माता उसे व उसकी 2 बहनों के साथ लेकर मायके चली गई तथा वहीँ रहने लगी[3]. लाल बहादुर 10 वर्ष की आयु तक अपने नाना हजारी लाल के घर रहे! तथा मुगलसराय के रेलवे स्कुल में कक्षा IV शिक्षा ली, वहां उच्च विद्यालय न होने के कारण बालक को वाराणसी भेजा गया जहाँ वह अपने मामा के साथ रहे, तथा आगे की शिक्षा हरीशचन्द्र हाई स्कूल से प्राप्त की ! बनारस रहते एक बार लाल बहादुर अपने मित्रों के साथ गंगा के दूसरे तट मेला देखने गए! वापसी में नाव के लिए पैसे नहीं थे! किसी मित्र से उधार न मांग कर, बालक लाल बहादुर नदी में कूदते हुए उसे तैरकर पार कर गए[4].
        बाल्यकाल में, लाल बहादुर पुताकें पढ़ना भाता था विशेषकर गुरु नानक के verses. He revered भारतीय राष्ट्रवादी, समाज सुधारक एवं स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक .वाराणसी 1915 में महात्मा  गाँधी का भाषण सुनने के पश्चात् लाल बहादुर ने अपना जीवन देश सेवा को समर्पित कर दिया[5] !  महात्मा  गाँधी के असहयोग आन्दोलन 1921 में लाल बहादुर ने निषेधाज्ञा का उलंघन करते प्रदर्शनों में भाग लिया ! जिस पर उन्हें बंदी बनाया गया किन्तु अवयस्क होने के कारण छूट गए[6] ! फिर वे काशी विद्यापीठ वाराणसी में भर्ती हुए! वहां के 4 वर्षों में वे डा. भगवान दास के lectures on philosophy से अत्यधिक प्रभावित हुए! तथा राष्ट्रवादी में भर्ती हो गए ! काशी विद्यापीठ से 1926, शिक्षा पूरी करने पर उन्हें शास्त्री की उपाधि से विभूषित किया गया जो विद्या पीठ की सनातक की उपाधि  है, और उनके नाम का अंश बन गया[3] ! वे सर्वेन्ट्स ऑफ़ द पीपल सोसाईटी आजीवन सदस्य बन कर मुजफ्फरपुर में हरिजनॉं के उत्थान में कार्य करना आरंभ कर दिया बाद में संस्था के अध्यक्ष भी बने[8].
        1927 में, जब शास्त्री जी का शुभ विवाह मिर्ज़ापुर की ललिता देवी से संपन्न हुआ तो भारी भरकम दहेज़ का चलन था किन्तु शास्त्रीजी ने केवल एक चरखा व एक खादी  का कुछ गज का टुकड़ा  ही दहेज़ स्वीकार किया ! 1930 में,महात्मा  गाँधी के नमक सत्याग्रह के समय वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े, तथा ढाई वर्ष का कारावास हुआ[9]. एकबार, जब वे बंदीगृह में थे, उनकी एक बेटी गंभीर रूप से बीमार हुई तो उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में भाग न लेने की शर्त पर 15 दिवस की सशर्त छुट्टी दी गयी ! परन्तु उनके घर पहुँचने से पूर्व ही बेटी का निधन हो चूका था ! बेटी के अंतिम संस्कार पूरे कर, वे अवधि[10] पूरी होने से पूर्व ही स्वयं कारावास लौट आये !  एक वर्ष पश्चात् उन्होंने एक सप्ताह के लिए घर जाने की अनुमति मांगी जब उनके पुत्र को influenza हो गया था ! अनुमति भी मिल गयी किन्तु पुत्र एक सप्ताह मैं निरोगी नहीं हो पाया तो अपने परिवार के अनुग्रहों (pleadings, के बाद भी अपने वचन के अनुसार वे कारावास लौट आये[10].
        8 अगस्त 1942, महात्मा गाँधी ने मुंबई के गोवलिया टेंक में अंग्रेजों भारत छोडो की मांग पर भाषण दिया ! शास्त्री जी जेल से छूट कर सीधे पहुंचे जवाहरलाल नेहरु के hometown अल्लहाबाद और आनंद  भवन से एक सप्ताह स्वतंत्रता सैनानियों को निर्देश देते रहे ! कुछ दिन बाद वे फिर बंदी बनाकर कारवास भेज दिए गए और वहां रहे 1946 तक[12], शास्त्री जी कुलमिला कर 9 वर्ष जेल में रहे [13]. जहाँ वे पुस्तकें पड़ते रहे और इसप्रकार पाश्चात्य western philosophers, revolutionaries and social reformer की कार्य प्रणाली से अवगत होते रहे ! तथा मारी कुरी की autobiography का हिंदी अनुवाद भी किया[9].
        आज़ादी के बाद 
        भारत आजाद होने पर, शास्त्री जी अपने गृह प्रदेश उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव नियुक्त किये गए! गोविन्द  बल्लभ  पन्त के मंत्री मंडल के पुलिस व यातायात मंत्री बनकर पहली बार महिला कन्डक्टर की नियुक्ति की ! पुलिस को भीड़ नियंत्रण हेतु उन पर लाठी नहीं पानी की बौछार का उपयोग के आदेश दिए[14].
        1951 में राज्य सभा सदस्य बने तथा कांग्रेस महासचिव के नाते चुनावी बागडोर संभाली, तो 1952, 1957 व 1962 में प्रत्याशी चयन, प्रचार द्वारा जवाहरलाल  नेहरु को संसदीय चुनावों में भारी बहुमत प्राप्त हुआ! केंद्र में 1951 से 1956 तक रेलवे व यातायात मंत्री रहे, 1956 में महबूबनगर की रेल दुर्घटना में 112 लोगों की मृत्यु के पश्चात् भेजे शास्त्रीजी के त्यागपत्र को नेहरुजी ने स्वीकार नहीं किया[15]! किन्तु 3 माह पश्चात् तमिलनाडू के अरियालुर दुर्घटना (मृतक 114) का नैतिक व संवैधानिक दायित्व मान कर दिए त्यागपत्र को स्वीकारते नेहरूजी ने कहा शास्त्री जी इस दुर्घटना के लिए दोषी नहीं[3] हैं किन्तु इससे संवैधानिक आदर्श स्थापित करने का आग्रह है ! शास्त्री जी के अभूत पूर्व निर्णय की की देश की जनता ने भूरी भूरी प्रशंसा की ! 
        1957 में, शास्त्री जी संसदीय चुनाव के पश्चात् फिर मंत्रिमंडल में लिए गए, पहले यातायात व संचार मंत्री, बाद में वाणिज्य व उद्योग मंत्री[7] तथा 1961 में गृह मंत्री बने[3] तब क.संथानम[16] 
        की अध्यक्षता में भ्रष्टाचार निवारण कमिटी गठित करने में भी विशेष भूमिका रही ! 
        प्रधान मंत्री 
        लाल बहादुर शास्त्री  जी  का नेतृत्व 
        27 मई 1964 जवाहरलाल नेहरु की मृत्यु से उत्पन्न रिक्तता को 9 जून को भरा गया जब कांग्रेस अध्यक्षक. कामराज ने  प्रधान मंत्री पद के लिए एक मृदु भाषी, mild-mannered नेहरूवादी शास्त्री जी को उपयुक्त पाया तथा इसप्रकार पारंपरिक दक्षिणपंथी मोरारजी देसाई का विकल्प स्वीकार हुआ ! प्रधान मंत्री के रूप में राष्ट्र के नाम प्रथम सन्देश में शास्त्री जी ने को कहा[17]
        हर राष्ट्र के जीवन में एक समय ऐसा आता है, जब वह इतिहास के चौराहे पर खड़ा होता है और उसे अपनी दिशा निर्धारित करनी होती है !.किन्तु हमें इसमें कोई कठिनाई या संकोच की आवश्यकता नहीं है! कोई इधर उधर देखना नहीं हमारा मार्ग सीधा व स्पष्ट है! देश में सामाजिक लोकतंत्र के निर्माण से सबको स्वतंत्रता व वैभवशाली बनाते हुए विश्व शांति तथा सभी देशों के साथ मित्रता !
        शास्त्री जी विभिन्न विचारों में सामंजस्य निपुणता के बाद भी अल्प अवधि के कारण देश के अर्थ संकट व खाद्य संकट का प्रभावी हल न कर पा रहे थे ! परन्तु जनता में उनकी लोकप्रियता व सम्मान अत्यधिक था जिससे उन्होंने देश में हरित क्रांति लाकर खाली गोदामों को भरे भंडार में बदल दिया ! किन्तु यह देखने के लिए वो जीवित न रहे, पाकिस्तान से 22 दिवसीय युद्ध में, लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया "जय जवान जय किसान" देश के किसान को सैनिक समान बना कर देश की सुरक्षा के साथ अधिक अन्न उत्पादन पर बल दिया! हरित क्रांति व सफेद (दुग्ध) क्रांति[16] के सूत्र धार शास्त्री जी अक्तू.1964 में कैरा जिले में गए उससे प्रभावित होकर उन्होंने आनंद का देरी अनुभव से सरे देश को सीख दी तथा उनके प्रधानमंत्रित्व काल 1965 में नेशनल देरी डेवेलोपमेंट बोर्ड गठन हुआ ! 
        समाजवादी होते हुए भी उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को किसी का पिछलग्गू नहीं बनाया[16]. अपने कार्य काल 1965[7] में उन्होंने भ्रमण किया रूसयुगोस्लावियाइंग्लैंडकनाडा व बर्मा
        पाकिस्तान से युद्ध 
        भारत पाकिस्तानी युद्ध 1965
        पाकिस्तान ने आधे कच्छ, पर अपना अधिकार जताते अपनी सेनाएं अगस्त 1965 में भेज दी, which skirmished भारतीय टेंक की कच्छ की मुठभेढ़ पर लोक सभा में, शास्त्री जी का वक्तव्य[17]:
        “ अपने सीमित संसाधनों के उपयोग में हमने सदा आर्थिक विकास योजना तथा परियोजनाओं को प्रमुखता दी है, अत: किसी भी चीज को सही परिपेक्ष्य में देखने वाला कोई भी समझ सकता है कि भारत की रूचि सीमा पर अशांति अथवा संघर्ष का वातावरण बनाने में नहीं हो सकती !... इन परिस्थितियों में सरकार का दायित्व बिलकुल स्पष्ट है और इसका निर्वहन पूर्णत: प्रभावी ढंग से किया जायेगा ...यदि आवश्यकता पड़ी तो हम गरीबी में रह लेंगे किन्तु देश कि स्वतंत्रता पर आँच नहीं आने देंगे!  ”
          ( It would, therefore, be obvious for anyone who is prepared to look at things objectively that India can have no possible interest in provoking border incidents or in building up an atmosphere of strife... In these circumstances, the duty of Government is quite clear and this duty will be discharged fully and effectively... We would prefer to live in poverty for as long as necessary but we shall not allow our freedom to be subverted.)
        पाकिस्तान कि आक्रामकता का केंद्र है कश्मीर. जब सशस्त्र घुसपैठिये पाकिस्तान से जम्मू एवं कश्मीर राज्य में घुसने आरंभ हुए, शास्त्री जी ने पाकिस्तान को यह स्पष्ट कर दिया कि ईंट का जवाब पत्थर से दिया जायेगा[18] अभी सित.1965 में ही पाक सैनिकों सहित सशस्त्र घुसपैठियों ने सीमा पार करते समय सब अपने अनुकूल समझा होगा, किन्तु ऐसा था नहीं और भारत ने भी युद्ध विराम रेखा (अब नियंत्रण रेखा) के पार अपनी सेना भेज दी है तथा युद्ध होने पर पाकिस्तान को लाहौर के पास अंतर राष्ट्रीय सीमा पर करने कि चेतावनी भी दे दी है! टेंक महा संग्राम हुआ पंजाब में , and while पाकिस्तानी सेनाओं को कहीं लाभ हुआ, भारतीय सेना ने भी कश्मीर का हाजी पीर का महत्त्व पूर्ण स्थान अधिकार में ले लिया है, तथा पाकिस्तानी शहर लाहौर पर सीधे प्रहार करते रहे! 
        17 सित.1965, भारत पाक युद्ध के चलते भारत को एक पत्र  चीन से मिला. पत्र में, चीन ने भारतीय सेना पर उनकी सीमा में सैन्य उपकरण लगाने का आरोप लगाते, युद्ध की धमकी दी अथवा उसे हटाने को कहा जिस पर शास्त्री जी ने घोषणा की "चीन का आरोप मिथ्या है! यदि वह हम पर आक्रमण करेगा तो हम अपनी अपनी संप्रभुता की रक्षा करने में सक्षम हैं"[19]. चीन ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया किन्तु भारत पाक युद्ध में दोनों ने बहुत कुछ खोया है! .
        भारत पाक युद्ध समाप्त 23 सित.  1965 को संयुक्त राष्ट्र-की युद्ध विराम घोषणा से हुआ. इस अवसर पर प्र.मं.शास्त्री जी ने कहा[17]:
        “ दो देशों की सेनाओं के बीच संघर्ष तो समाप्त हो गया है संयुक्त राष्ट्र- तथा सभी शांति चाहने वालों के लिए अधिक महत्वपूर्ण है is to bring to an end the deeper conflict... यह कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? हमारे विचार से, इसका एक ही हल है शांतिपूर्ण सहा अस्तित्व! भारत इसी सिद्धांत पर खड़ा है; पूरे विश्व का नेतृत्व करता रहा है! उनकी आर्थिक व राजनैतिक विविधता तथा मतभेद कितने भी गंभीर हों, देशों में शांतिपूर्ण सहस्तित्व संभव है !  ” 
        ताश कन्द का काण्ड 
        युद्ध विराम के बाद, शास्त्री जी तथा  पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुहम्मद अयूब खान वार्ता के लिए ताश कन्द (अखंडित रूस, वर्तमान उज्बेकिस्तान) अलेक्सेई कोस्य्गिन के बुलावे पर 10 जन.1966 को गए, ताश कन्द समझौते पर हस्ताक्षर किये! शास्त्री जी को संदेह जनक परिस्थितियों में मृतक बताते, अगले दिन/रात्रि के 1:32 बजे [7]  हृदयाघट का घोषित किया गया ! यह किसी सरकार के प्रमुख की सरकारी यात्रा पर विदेश में मृत्यु की अनहोनी घटना है[20]
        शास्त्री जी की मृत्यु का रहस्य ?
        शास्त्री जी की रहस्यमय मृत्यु पर उनकी विधवा पत्नी ललिता शास्त्री  कहती रही कि उनके पति को विष दिया गया है. कुछ उनके शव का नीला रंग, इसका प्रमाण बताते हैं.शास्त्री जी को विष देने के आरोपी रुसके रसोइये को बंदी भी बनाया गया किन्तु वो प्रमाण के अभाव में बच गया[21]
        2009 में, जब अनुज धर, लेखक CIA's Eye on South Asia, RTI में  (Right to Information Act) प्रधान मंत्री कार्यालय से कहा, कि शास्त्री जी की मृत्यु का कारण सार्वजानिक किया जाये, विदेशों से सम्बन्ध बिगड़ने की बात कह कर टाल दिया गया देश में असंतोष फैलने व संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन भी बताया गया[21]
        PMO ने इतना तो स्वीकार किया कि शास्त्री जी कि मृत्यु से सम्बंधित एक पत्र कार्यालय के पास है! सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि शव की रूस USSR में post-mortem examination जाँच नहीं की गई, किन्तु शास्त्री जी के वैयक्तिगत चिकित्सक  डा. र.न.चुघ ने जाँच कर रपट दी थी! किस प्रकार हर सच को छुपाने का मूल्य लगता है और सच का झूठ / झूठ का सच यहाँ सामान्य प्रक्रिया है कुछ भ हो सकता है[21]
        स्मृतिचिन्ह 
        आजीवन सदाशयता व विनम्रता के प्रतीक माने गए, शास्त्री जी एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया, व दिल्ली के "विजय घाट" उनका स्मृति चिन्ह बनाया गया ! अनेकों शिक्षण सस्थान, शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक संसथान National Academy of Administration (Mussorie) तथा शास्त्री इंडो -कनाडियन इंस्टिट्यूट अदि उनको समर्पित हैं[22]"
        अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है! इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!"- तिलक

        Saturday, January 1, 2011

        One may celebrate even English New Year,

        panjabi, gujrati, telugu, malyalam.

        पंजाबी ਅਂਗ੍ਰੇਜੀ ਕਾ ਨਵ ਵਰ੍ਸ਼, ਭਲੇ ਹੀ ਮਨਾਏਂ

         "ਅਂਗ੍ਰੇਜੀ ਕਾ ਨਵ ਵਰ੍ਸ਼, ਭਲੇ ਹੀ ਮਨਾਏਂ; ਉਮਂਗ ਉਤ੍ਸਾਹ, ਚਾਹੇ ਜਿਤਨਾ ਦਿਖਾਏਂ;ਚੈਤ੍ਰ ਕੇ ਨਵ ਰਾਤ੍ਰੇ, ਜਬ ਜਬ ਭੀ ਆਯੇਂ; ਘਰ ਘਰ ਸਜਾਏਂ, ਉਮਂਗ ਕੇ ਦੀਪਕ ਜਲਾਏਂ; ਆਨਂਦ ਸੇ, ਬ੍ਰਹ੍ਮਾਣ੍ਡ ਤਕ ਕੋ ਮਹਕਾਏਂ; ਵਿਸ਼੍ਵ ਮੇਂ, ਭਾਰਤ ਕਾ ਗੌਰਵ ਬਢਾਏਂ " ਅਂਗ੍ਰੇਜੀ ਕਾ ਨਵ ਵਰ੍ਸ਼ 2011, ਵ ਵਰ੍ਸ਼ ਕੇ 365 ਦਿਨ ਹੀ ਮਂਗਲਮਯ ਹੋਂ, ਭਾਰਤ ਭ੍ਰਸ਼੍ਟਾਚਾਰ ਵ ਆਤਂਕਵਾਦ ਸੇ ਮੁਕ੍ਤ ਹੋ, ਹਮ ਅਪਨੇ ਆਦਰ੍ਸ਼ ਵ ਸਂਸ੍ਕਰਤਿ ਕੋ ਪੁਨਰ੍ਪ੍ਰਤਿਸ਼੍ਠਿਤ ਕਰ ਸਕੇਂ ! ਇਨ੍ਹੀ ਸ਼ੁਭਕਾਮਨਾਓਂ ਕੇ ਸਾਥ, ਭਵਦੀਯ.. ਤਿਲਕ ਸਂਪਾਦਕ ਯੁਗਦਰ੍ਪਣ ਰਾਸ਼੍ਟ੍ਰੀਯ ਸਾਪ੍ਤਾਹਿਕ ਹਿਂਦੀ ਸਮਾਚਾਰ-ਪਤ੍ਰ. 09911111611. ਪਤ੍ਰਕਾਰਿਤਾ ਵ੍ਯਵਸਾਯ ਨਹੀਂ ਏਕ ਮਿਸ਼ਨ ਹੈ-ਯੁਗਦਰ੍ਪਣ

        गुजराती અંગ્રેજી કા નવ વર્ષ, ભલે હી મનાએં

         "અંગ્રેજી કા નવ વર્ષ, ભલે હી મનાએં; ઉમંગ ઉત્સાહ, ચાહે જિતના દિખાએઁ;ચૈત્ર કે નવ રાત્રે, જબ જબ ભી આયેં; ઘર ઘર સજાએઁ, ઉમંગ કે દીપક જલાએં; આનંદ સે, બ્રહ્માણ્ડ તક કો મહકાએં; વિશ્વ મેં, ભારત કા ગૌરવ બઢાએં " અંગ્રેજી કા નવ વર્ષ 2011, વ વર્ષ કે 365 દિન હી મંગલમય હોં, ભારત ભ્રષ્ટાચાર વ આતંકવાદ સે મુક્ત હો, હમ અપને આદર્શ વ સંસ્કૃતિ કો પુનર્પ્રતિષ્ઠિત કર સકેં! ઇન્હી શુભકામનાઓં કે સાથ, ભવદીય.. તિલક સંપાદક યુગદર્પણ રાષ્ટ્રીય સાપ્તાહિક હિંદી સમાચાર-પત્ર. 09911111611.

        પત્રકારિતા વ્યવસાય નહીં એક મિશન હૈ-યુગદર્પણ

        तेलुगु అంగ్రేజీ కా నవ వర్ష, భలే హీ మనాఏం

         "అంగ్రేజీ కా నవ వర్ష, భలే హీ మనాఏం; ఉమంగ ఉత్సాహ, చాహే జితనా దిఖాఏఁ; చైత్ర కే నవ రాత్రే, జబ జబ భీ ఆయేం; ఘర ఘర సజాఏఁ, ఉమంగ కే దీపక జలాఏం; ఆనంద సే, బ్రహ్మాణ్డ తక కో మహకాఏం; విశ్వ మేం, భారత కా గౌరవ బఢాఏం " అంగ్రేజీ కా నవ వర్ష 2011, వ వర్ష కే 365 దిన హీ మంగలమయ హోం, భారత భ్రష్టాచార వ ఆతంకవాద సే ముక్త హో, హమ అపనే ఆదర్శ వ సంస్కృతి కో పునర్ప్రతిష్ఠిత కర సకేం ! ఇన్హీ శుభకామనాఓం కే సాథ, భవదీయ.. తిలక సంపాదక యుగదర్పణ రాష్ట్రీయ సాప్తాహిక హిందీ సమాచార-పత్ర. 09911111611. పత్రకారితా వ్యవసాయ నహీం ఏక మిశన హై-యుగదర్పణ

        मलयालम അംഗ്രേജീ കാ നവ വര്ഷ, ഭലേ ഹീ മനാഏം

         "അംഗ്രേജീ കാ നവ വര്ഷ, ഭലേ ഹീ മനാഏം; ഉമംഗ ഉത്സാഹ, ചാഹേ ജിതനാ ദിഖാഏം; ചൈത്ര കേ നവ രാത്രേ, ജബ ജബ ഭീ ആയേം; ഘര ഘര സജാഏം, ഉമംഗ കേ ദീപക ജലാഏം; ആനംദ സേ, ബ്രഹ്മാണ്ഡ തക കോ മഹകാഏം; വിശ്വ മേം, ഭാരത കാ ഗൌരവ ബഢാഏം " അംഗ്രേജീ കാ നവ വര്ഷ 2011, വ വര്ഷ കേ 365 ദിന ഹീ മംഗലമയ ഹോം, ഭാരത ഭ്രഷ്ടാചാര വ ആതംകവാദ സേ മുക്ത ഹോ, ഹമ അപനേ ആദര്ശ വ സംസ്കൃതി കോ പുനര്പ്രതിഷ്ഠിത കര സകേം!  ഇന്ഹീ ശുഭകാമനാഓം കേ സാഥ, ഭവദീയ.. തിലക  സംപാദക യുഗദര്പണ രാഷ്ട്രീയ സാപ്താഹിക ഹിംദീ സമാചാര-പത്ര. 09911111611. പത്രകാരിതാ വ്യവസായ നഹീം ഏക മിശന ഹൈ-യുഗദര്പണ
        विश्वगुरु रहा वो भारत, इंडिया के पीछे कहीं खो गया ! इंडिया से भारत बनकर ही विश्व गुरु बन सकता है- तिलक
        "अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है! इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!"- तिलक

        Saturday, December 18, 2010

        काकोरी कांड (क्या भारत आजाद है ?)

        काकोरी कांड (क्या भारत आजाद है ?)

        भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों द्वारा चलाए जा रहे इस संग्राम
        को गति देने के लिए धन की तत्काल व्यवस्था की आवश्यकता के कारण शाहजहाँपुर में हुई बैठक
        के मध्य राजेन्द्रनाथ ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनाई।
        इस योजना को कार्यरूप देने के लिए राजेन्द्रनाथ ने 9 अगस्त 1925 को
        लखनऊ के काकोरी से छूटी 8 डाउन ट्रेन पर क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ और
        ठाकुर रोशन सिंह व 19 अन्य सहयोगियों के सहयोग से धावा बोल दिया।
        बाद में अंग्रेजी शासन ने सभी 23 क्रांतिकारियों पर काकोरी कांड के नाम पर
        सशस्त्र युद्ध छेड़ने तथा खजाना लूटने का मुकदमा चलाया जिसमें राजेन्द्रनाथ,
        रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ तथा रोशन सिंह को फाँसी की सजा सुनाई गई।
        !! 
        आज है, 19 दिसंबर 1927 का वह दिन जब 'काकोरी कांड' के क्रांतिकारियों को फांसी दी गयी.
        आइये उनका स्मरण करते हैं !! 

        काकोरी जो लखनऊ जिले में एक छोटा सा गाँव हैं. स्वतंत्रता संग्राम को कुचलने भेजी
        बंदूके और धन रोकने हेतु अंग्रेजो की ट्रेन को यहाँ लूटा गया इसलिए इसका
        नाम काकोरी ट्रेन डकैती पड़ा. सबसे पहले राजेंद्र लाहिड़ी को 17 दिसंबर सन
        1927 को गोंडा जिले (उत्तर प्रदेश) में फांसी दी गयी. ट्रेन को लूटने में
        कुल 10 क्रन्तिकारी साथी थे. किन्तु जब गिरफ्तारियां हुई तो 40 से भी अधिक
        लोग पकडे गए. कुछ तो निर्दोष थे. अशफाक उल्ला और बख्शी लाल तुरंत नहीं
        पकडे जा सके. अंग्रेजी शासन ने इस मुकदमे में 10 लाख रुपये से भी अधिक व्यय किया.
        बनवारी लाल ने गद्दारी की और इकबालिया गवाह बन गया. इसने सभी
        क्रांतिकारियों को पकड़वाने में अंग्रेजो की सहायता की. इसे भी 5 वर्ष की
        सजा हुई. 18 महीने तक मुक़दमा चला पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र
        लाहिड़ी और रौशन सिंह को फांसी की सजा हुई. राजेंद्र लाहिड़ी की 'अपील को
        प्रीवी काउन्सिल' ने अस्वीकार कर दिया. शचींद्र नाथ सान्याल को कालेपानी की
        सजा हुई. बाद में पकडे गए अभियुक्तों में अशफाक उल्ला को फैजाबाद जिले में 19 दिसंबर को
        फांसी हुई और बख्शी लाल को कालेपानी की सजा हुई.

        ...अशफाक उल्ला बड़ी ख़ुशी के साथ कुरान - शरीफ का बस्ता कंधे से टांगे हुए हाजियों
        ( जो हज करने जाते हैं ) कि भांति 'लवेक' कहते और कलाम पढ़ते हुए फांसी के
        तख्ते के पास गए. तख्ते को उन्होंने चूमा और सामने खड़ी भीड़ से कहा ( जो
        उनकी फांसी को देखने आई हुई थी ) "मेरे हाथ इंसानी खून से कभी नहीं
        रगें, मेरे ऊपर जो इलज़ाम लगाया गया वह गलत हैं. खुदा के यहाँ मेरा इन्साफ
        होगा" ! इतना कह कर उन्होंने फांसी के फंदे को गले में डाला और खुदा का नाम
        लेते हुए दुनिया से कूच कर गए.
        उनके रिश्तेदार, चाहने वाले शव को शाहजहांपुर ले जाना चाहते थे.
        बड़ी मिन्नत करने के बाद अनुमति मिली इनका
        शव जब लखनऊ स्टेशन पर उतारा गया , तब कुछ लोगो को देखने का अवसर मिला.
        चेहरे पर 10 घंटे के बाद भी बड़ी शांति और मधुरता थी बस आँखों के नीचे कुछ
        पीलापन था. शेष चेहरा तो ऐसा सजीव था जैसे कि अभी अभी नींद आई
        हैं, यह नींद अनंत थी. अशफाक कवि भी थे उन्होंने मरने से पहले शेर लिखा था
        - "तंग आकर हम भी उनके जुल्म के बेदाद से !
        चल दिए अदम ज़िन्दाने फैजाबाद से !!
        ऐसे क्रांतिकारियों को मेरा कोटि कोटि प्रणाम !"
        प्रश्न उठता है क्या भारत आजाद है? अंग्रेज़ी शासन व इस शासन में अंतर है ?
        इसे देख दोनों प्रश्नों के उत्तर में कोई भी कहेगा - नहीं 

        अंग्रेज़ी शासन में भी देश भक्तों व उनके समर्थकों तक को प्रताड़ित किया जाता था,
        तथा शासन समर्थकों को राय साहब की पदवी व पुरुस्कार मिलते थे ?
        आज भी शर्मनिरपेक्ष शासन में देश भक्तों को भगवा आतंक कह प्रताड़ित तथा
        अफज़ल व आतंकियों को समर्थन, कश्मीर के अल कायदा के कुख्यात आतंकवादी
         
        गुलाम मुहम्मद मीर को राष्ट्र की अति विशिष्ठ सेवाओं के लिए " पद्म श्री " सम्मान ?
        "अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है! इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!"- तिलक

        Thursday, December 2, 2010

        खुदीराम बोस

        खुदीराम बोस भारत को कुचल रहे ब्रिटिश पर जो पहला बम था, इस राष्ट्र नायक ने फैंका था,स्कूल में भी वह वन्दे मातरम जैसे पवित्र शब्दों की ओर आकर्षित था ! '(मैं भारत माता के चरणों में शीश नवाता हूँ !) और आजादी के युद्ध में कूद पड़े. 16 वर्ष का लड़का पुलिस अवज्ञा कर 19 वर्ष की आयु में जब वह बलिदान हुआ उसके हाथों में एक पवित्र पुस्तक भागवद गीता (देवी गीत) के साथ उसके होठों पर था वंदे मातरम का नारा.--लेखक ! यह अवसर था, फरवरी 1906 में एक भव्य प्रदर्शनी की बंगाल में मेदिनीपुर में व्यवस्था की गयी थी. उद्देश्य तो भारत के ब्रिटिश शासक के भारत में अन्याय को छिपाने का था. प्रदर्शनी पर कठपुतलिया और चित्र थे, जो धारणा बना सकते है कि विदेशी ब्रिटिश शासक भारत के लोगों की सहायता कर रहे थे! प्रदर्शनी देखने के लिए वहाँ बड़ी भीड़ थी ! तब, विज्ञप्ति शीर्षक 'सोनार बांग्ला' के साथ वंदे 'मातरम् नारा लिए पत्रक के एक बंडल के साथ 16 वर्ष का एक लड़का दिखाई दिया, वह पत्रक उन लोगों को वितरण किया गया. इसके अतिरिक्त यह प्रदर्शनी लगाने में अंग्रेजों का असली उद्देश्य यह भी पत्रक में बताया गया. तथा ब्रिटिश अन्याय और अत्याचार के विभिन्न रूपों का खुलासा भी !प्रदर्शनी के लिए आगंतुकों के अतिरिक्त, वहाँ कुछ एक इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादार भी थे. उन लोगों ने अंग्रेजों के अन्याय उजागर करने का विरोध किया ! वंदे मातरम् जैसे शब्द '(स्वतंत्रता) और' स्वराज्य '(आत्म शासन) उन्हें पिन और सुई की तरह चुभते थे. वे पत्रक वितरण से लड़के को रोकने का प्रयास किया. उनकी आँखें गुस्से से लाल, वे लड़के पर गुर्राए glared, उसे डांटा और उसे धमकाते किया बवाल. लेकिन उन्हें अनदेखा कर लड़का शांति से पत्रक वितरण करता चला गया. जब कुछ लोगों ने उस पर कब्जा करने का प्रयास किया, वह चालाकी से भाग निकले. अंतत: एक पुलिसकर्मी के हाथ की पकड़ लड़के पर पद गई वह पत्रक का बंडल भी खींच लिया. लेकिन पकड़ने के लिए लड़का इतना आसान नहीं था. वह अपने हाथ झटकाता मुक्त हुआ. फिर वह हाथ लहराया और पुलिस वाले की नाक पर शक्तिशाली वार किया. फिर वह पत्रक भी अधिकार में ले लिया, और कहा, "ध्यान रखो, कि मेरे शरीर को स्पर्श नहीं! मैं देखता हूँ  आप मुझे कैसे एक वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकते हैं!."वो झटका प्राप्त पुलिस वाला फिर आगे बढ़ा, लेकिन लड़का वहाँ नहीं था. वह भीड़ के बीच गायब हो गया था.चाय पान के समय, लोगों के रूप में वंदे 'मातरम् तूफान से पुलिस और राजा के प्रति वफादार भी अपमानित और आश्चर्य से भरे दुखी थे.बाद में एक मामला लड़के के विरुद्ध दर्ज किया गया था, लेकिन अदालत ने उसे लड़के कि कम आयु के आधार पर निर्धारित किया है.जो वीर लड़का इतना बहादुरी से मेदिनीपुर प्रदर्शनी में पत्रक वितरित कर गया और जिससे अंग्रेजों की कुत्सित चालों को हराया खुदीराम बोस था.खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसम्बर 1889 को मेदिनीपुर जिले के गांव बहुवैनी में हुआ था. उनके पिता त्रैलोक्य नाथ बसु नादाज़ोल राजकुमार के शहर के तहसीलदार थे. उसकी माँ लक्ष्मी प्रिया देवी जो अपने धार्मिक जीवन और उदारता के लिए एक पवित्र औरत अधिक जानी जाती थी. हालांकि घर में कुछ बच्चों पैदा हुए थे सब की जन्म के बाद शीघ्र ही मृत्यु हो गई. केवल एक बेटी बच गई. अंतिम बच्चा, खुदीराम बोस, एकमात्र जीवित बेटा था.
        बोस परिवार को एक नर बच्चे की चाह थी. लेकिन लंबे समय के लिए उनके आनंद की आयु पर्याप्त नहीं रह सकी. वे अप्रत्याशित रूप से मर गया जब खुदीराम मात्र 6 वर्ष था. उसकी बड़ी बहन अनुरुपा देवी और जीजाजी अमृतलाल ने उसे पालने की जिम्मेदारी कंधे पर ली थी. अनुरुपा देवी ने एक माँ के स्नेह के साथ खुदीराम का पालन कियावह चाहती थी, उसका छोटा भाई अत्यधिक शिक्षित, एक उच्च पद पाने के बाद नाम हो! वह इसलिए उसे पास के एक स्कूल में भर्ती कराया.  ऐसा नहीं था कि खुदीराम नहीं सीख सकता थावह कुशाग्र था और चीजों को आसानी से समझ सकता थालेकिन उसका ध्यान अपनी कक्षा में पाठ के लिए नहीं लगाया जा सका. हालांकि उनके शिक्षकों ने अपनी आवाज के शीर्ष पर चिल्लाया, वह सबक नहीं सुना. सबक से पूरी तरह से असंबंधित विचार उसके सिर में घूमते रहे थे जन्म से एक देशभक्त, खुदीराम बोस ने 7-8 वर्ष की आयु में भी सोचा, ' भारत हमारा देश है. यह एक महान देश है. हमारे बुजुर्गों का कहना है कि यह सहस्त्रों वर्षों से ज्ञान का केंद्र है. तो क्रोधित ब्रिटिश यहाँ क्यों हो ? उनके अधीन, हमारे लोग भी जिस रूप में वे चाहते नहीं रह सकते. बड़ा होकर, मैं किसी तरह उन्हें देश से बाहर खदेड़ दूंगा 'पूरे दिन लड़का इन विचारों में लगा था. इस प्रकार जब वह पढ़ने के लिए एक किताब खोले, उसे एक क्रोधित ब्रिटिश की हरी आंखों का सामना करना पड़ा. यहां तक कि जब वह खा रहा था, वही याद उसका पीछा करती रही और स्मृति उसके दिल में एक अजीब सा दर्द लाई. उसकी बहन और उसके जीजा दोनों ने सोचा लड़का परेशान क्यों है ? उन्होंने सोचा कि उसकी माँ की स्मृति उसे परेशान किया है, और उसे अधिक से अधिक स्नेह दिया. किन्तु खुदीराम भारत माता के बारे में दुखी था. उसकी पीड़ा में दिन पर दिन वृद्धि हुई. 
        गुलामी से बदतर रोग न कोय ?एक बार खुदीराम एक मंदिर में गया था. कुछ व्यक्ति मंदिर के सामने बिना आसन जमीन पर लेट रहे थे. "क्यों लोग बिना आसन जमीन पर लेट रहे हैं", खुदीराम ने कुछ व्यक्तियों से पूछा, उनमें से एक ने विस्तार से बताया: "वे किसी न किसी बीमारी से पीड़ित हैं व एक मन्नत मानी है और भोजन और पानी के बिना यहाँ पड़ रहेंगे जब तक भगवान उनके सपने में दिखकर रोग ठीक करने का वादा नहीं देता ..."खुदीराम एक पल के लिए सोचा और कहा, "एक दिन मुझे भी तप करने के लिए भूख और प्यास भुला कर और इन लोगों की तरह जमीन पर बिना आसन लेटना होगा.""आपको क्या रोग है?" एक आदमी ने लड़के से पूछा! खुदीराम हँसे, और कहा, "गुलामी से बदतर रोग न कोय ? हमें इसे बाहर खदेढ़ना होगा ."कितनी  कम उम्र में भी, खुदीराम ने इतनी गहराई से देश की स्वतंत्रता के बारे में सोचा था. लेकिन वह इसे कैसे प्राप्त करे ? यह समस्या हमेशा उस के मन को घेरे रखती थी . वह सफलतापूर्वक कैसे अपने कर्तव्य पूरा कर सकता है? इस प्रकार चिंतित खुदीराम से एक दिन का नाद सुना 'वंदे मातरम', 'भारत माता की जय' (विजय मदर इंडिया के लिए). वह इन शब्दों से रोमांचित था, उसकी आँखें चमकने लगी और वह आनंद का अनुभव किया.
        पत्रकारिता व्यवसाय नहीं एक मिशन है-युगदर्पण"अंधेरों के जंगल में,दिया मैंने जलाया है! इक दिया,तुम भी जलादो;अँधेरे मिट ही जायेंगे !!"- तिलक